क्या था पाइक विद्रोह?|| Paik Rebellion

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क्या था पाइक विद्रोह?, Paik Rebellion, राजा मुकुन्ददेव-2, जयी राजगुरु, कौन थे पाइक?, पाइक खोर्धा, बख्शी जगबंधु

क्या था यह ‘पाइक विद्रोह’ जिसे 200 साल बाद इतिहास के पन्नों से लेकर राजनीति के मैदान पर ला खड़ा किया  गया है?

साल 1803 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने मराठाओं को हराकर ओडिशा पर कब्ज़ा किया. सत्ता हथियाने के बाद अंग्रेज़ों ने खोर्धा के तत्कालीन राजा मुकुन्ददेव-2 से पुरी के विश्वविख्यात जगन्नाथ मंदिर का प्रबंधन छीन लिया. चूँकि मुकुन्ददेव-2 उस समय नाबालिग थे, इसलिए राज्य चलाने का पूरा भार उनके प्रमुख सलाहकार जयी राजगुरु संभाल रहे थे. जयी राजगुरु को यह अपमान बर्दाश्त नहीं था और उन्होंने अंग्रेज़ों के खिलाफ जंग छेड़ दी. लेकिन राजगुरु को कंपनी की फ़ौज ने गिरफ्तार कर लिया और फांसी दे दी.

अंग्रेज़ शायद यह मानकर चल रहे थे कि जिस बेरहमी से राजगुरु को बीच चौराहे पर फांसी दी गई उससे सहमकर ओडिशा के लोग बगावत से बाज आएंगे, लेकिन हुआ बिलकुल इसके विपरीत. राजगुरु की फांसी के बाद अंग्रेज़ों के खिलाफ गुस्सा उमड़ पड़ा और जगह-जगह उन पर हमले शुरू हो गए.

कौन थे पाइक?

पाइक खोर्धा के राजा के वह खेतिहर सैनिक थे, जो युद्ध के समय शत्रुओं से लड़ते थे और शांति के समय राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने में मदद करते थे. इसके बदले में उन्हें राजा की ओर से मुफ्त में जागीर मिली हुई थी, जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता हथियाने के बाद समाप्त कर दिया.

यही नहीं, कंपनी ने किसानों के लगान कई गुना बढ़ा दिया, ‘कौड़ी’ की जगह रौप्य सिक्कों का प्रचलन किया और नमक बनाने पर पाबन्दी लगा दी. सन 1814 में पाइकों के सरदार बख्शी जगबंधु विद्याधर महापात्र, जो मुकुन्ददेव-2 के सेनापति थे- की जागीर छीन ली गई और उन्हें पाई पाई के लिए मोहताज़ कर दिया.

इसके बाद अंग्रेज़ों के खिलाफ़ लोगों का गुस्सा और बढ़ गया. बख्शी जगबंधु के नेतृत्व में पाइकों ने जंग छेड़ दिया. शीघ्र ही इस लड़ाई में खोर्धा के अलावा पुरी, बाणपुर, पीपली, कटक, कनिका, कुजंग और केउंझर के बागी भी शामिल हो गए.

साल 1817 में अंग्रेज़ों के अत्याचार से नाराज़ घुमुसर (बर्तमान के कंधमाल) और बाणपुर के आदिवासी कंध संप्रदाय के लोग बख्शी के सेना के साथ मिलकर अंग्रेज़ों पर धावा बोल दिया. यह सम्मिलित आक्रमण इतना भीषण था कि अंग्रेज़ों को खोर्धा से दुम दबाकर भागना पड़ा.

बागियों ने करीब 100 अंग्रेज़ों की हत्या कर दी, सरकारी ख़ज़ाने को लूटा और खोर्धा में स्थित कंपनी के प्रशासनिक दफ्तर पर कब्ज़ा कर लिया. इसके बाद भी विद्रोहियों ने कई जगह अंग्रेज़ों को मात दी, लेकिन आखिरकार कंपनी के बेहतर युद्धास्त्र के सामने उन्हें हारना पड़ा.

कई बागियों को फांसी दी गई, कइयों को बंदी बना लिया गया और 100 से भी अधिक लोगों को तड़ीपार कर दिया गया. 1817 के हीरो बख्शी जगबंधु की कटक के बारबाटी किले में बंदी बनाया गया जहाँ 1821 में उनका देहांत हो गया. 1817 से शुरू हुआ जंग 1827 तक चलता रहा, लेकिन अंत में अंग्रेज़ों की जीत हुई.

सरकार का तर्क है कि चूँकि ‘पाइक विद्रोह’ एक व्यापक और जायज़ लड़ाई थी और ‘सिपाही विद्रोह’ से पूरे 40 साल पहले हुआ इसलिए उसे आज़ादी की पहली लड़ाई की मान्यता दी जानी चाहिए. लेकिन इतिहासकार इस तर्क से सहमत नहीं हैं.

लेकिन इतिहासकारों का एक तबका मानता है कि देश के इतिहास में ‘पाइक विद्रोह’ को उसका उचित दर्ज़ा नहीं मिला है. ऐसे ही कुछ इतिहासकारों को लेकर सरकार ने एक कमिटी बनाई है और उसे सारे तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर एक दस्तावेज तैयार करने की ज़िम्मेदारी दी है, जो केंद्र सरकार को सौंपी जाएगी.

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