पेश है ‘भानगढ़ और अनसुनी कहानियां’ का पहला पार्ट

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पेश है ‘भानगढ़ और अनसुनी कहानियां’ का पहला पार्ट

भानगढ़ की इन्हीं बातों को हम अपने रीडर्स के लिए तीन हिस्सों में लेकर आए हैं। आज पेश है ‘भानगढ़ और अनसुनी कहानियां’ का पहला पार्ट…

भानगढ़…समय के साथ एक उजड़ा हुआ किला, लेकिन इसकी चारदीवारी में इतिहास, मान्यताओं के साथ अफवाहों के न जाने कितने किस्से बिखरे हुए हैं। हर मौसम में ये किला रंग बदलता है। भीषण गर्मियों में इसका उजाड़पन डराता है, तो बारिश की बूंदों से नहाने के बाद ये हरियाली की चादर ओढ़ लेता है।

भानगढ़ की इन्हीं बातों को हम अपने रीडर्स के लिए तीन हिस्सों में लेकर आए हैं। आज पेश है ‘भानगढ़ और अनसुनी कहानियां’ का पहला पार्ट…

अरावली की गोद में बिखरे इन वीरान खंडहरों को देखकर एक विचित्र-सा जो रोमांच होता है, उसका कारण शायद यह है कि प्रचलित मान्यताओं के आधार पर इसे एक भुतहा शहर मान लिया गया है।

एक तरफ पूरी तरह से पहाड़ियों से घिरा और मीलों तक उजड़ा यह पुरातन शहर भले ही कहने को शापग्रस्त मान लिया गया हो, लेकिन इसके खंडहरों की वीरानी में भी सम्मोहित करने वाला सौन्दर्य बसता है।

इस सम्मोहन का कारण शायद इस ध्वस्त इमारतों के बीच हजारों की संख्या में उगे केवड़े के पेड़ों का हरापन और उनसे निकलने वाली गंध भी हो सकती है। क्योंकि जब तेज हवा चलती है तो पूरे वातावरण में केवड़े की खूशबू वातावरण को और रहस्यमय बना देती है।

इस भग्न शहर के ठीक बीच में स्थित दो मंजिला जौहरी बाजार से छतों का साया वक्त के साथ विदा हो गया है, लेकिन आसानी से महसूस किया जा सकता है कि जब यह बाजार अपनी पूरी आभा के साथ गुलजार रहा होगा, तो यहां की चहल-पहल का क्या रंग रहा होगा?

किवदंतियों के भंवर में डूबे इस उजाड़ का नाम आसपास रहने वालों के लिए ‘भूतों का भानगढ़’ है। सैकड़ों साल हो गए, शायद ही कोई व्यक्ति भानगढ़ में रात को ठहरने की हिम्मत कर सका हो। कहा जाता है कि एक बार एक अंग्रेज अपने एक वनकर्मी के साथ रात को इस गढ़ की हकीकत जानने के लिए रुका था और सुबह दोनों मृत मिले थे। तभी से सरकार ने सूचना पट्ट लगवाकर भानगढ़ में रात में किसी के भी यहां रुकने पर पाबंदी लगा दी।

इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि उन्नीस गांवों की बट लेकर बसाई गई थी भानगढ़ की राजधानी। 1573 में आमेर के राजा भगवंत दास ने यहां किले का निर्माण करवाा था और अपने पुत्र माधोसिंह, जो मुगल बादशाह अकबर के नवरत्न मानसिंह का छोटा भाई था को अकबर की सहमति से यहां का शासक बनाया था। इसमें बारह गांव मीणाओं से लड़कर लिए गए थे।

इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि उन्नीस गांवों की बट लेकर बसाई गई थी भानगढ़ की राजधानी। 1573 में आमेर के राजा भगवंत दास ने यहां किले का निर्माण करवाा था और अपने पुत्र माधोसिंह, जो मुगल बादशाह अकबर के नवरत्न मानसिंह का छोटा भाई था को अकबर की सहमति से यहां का शासक बनाया था। इसमें बारह गांव मीणाओं से लड़कर लिए गए थे।

बताया जाता है कि माधोसिंह ने हल्दी घाटी के युद्ध में अकबर की ओर से भाग भी लिया था, जिसमें वह घायल भी हुआ था। 1630 की एक लड़ाई में माधोसिंह की मृत्यु हो गई। माधोसिंह का पुत्र छतरसिंह भी बाद में मुगलों के साथ हुए युद्ध में अपने दो बेटों भीमसिंह व आनंद सिंह के साथ मारा गया।

इसके बाद उसके बेटे अजब सिंह ने अजबगढ़ का किला बनाकर वहीं रहना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि 1783 के अकाल में भानगढ़ पूरी तरह से उजड़ गया।

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